हमारे बारे में

       मूगा व एरी संवर्धन के क्षेत्र में समुचित कार्यान्वयन के लिए केन्द्रीय मूगा एरी अनुसंधान व प्रशिक्षण संस्थान एक अनुसंधान व विकास संस्थान है जो केन्द्रीय रेशम बोर्ड, वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन कार्यरत है। यह संस्थान मूगा व एरी संवर्धन के कृषिक्षेत्र से कोसोत्तर क्षेत्रों की हर आवश्यकताएं की पूर्ति कर अनुसंधान व विकास से संबंधित सारी गतिविधियां सफल बनाने के लिए प्रयास किया जा रहा है। पूर्वोत्तर भारत के सभी राज्यों तथा पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्से में मूगा एवं एरी संवर्धन एक ग्रामीण आधारित उद्योग है।

            एरंड तथा टैपिओका किसान को लाभकारी अपनी अतिरिक्त आय सृजन क्षमता के कारण देश के अन्य भागों में फैलने लगा है। हाल ही के वर्षों में विकासात्मक तथा महत्वपूर्ण क्षेत्र विशेष में आधारभूत तथा अनुपयुक्त अनुसंधान किए जाने के लिए संस्थान में उपलब्ध बुनियादी  ढांचागत सुविधाओं को मजबूत बनाया गया है। अनुसंधान गतिविधियां की प्राथमिकता मूगा रेशम कीट तथा एरी की उत्पादकता में वृद्धि और इस तरह राज्यों के परंपरागत संवर्धन को अधिक लाभ प्रदान करनेवाला और टिकाऊपन व दीर्घकालिक उद्यम में होनेवाले परिवर्तन की दिशा में लागत प्रभावी प्रौद्योगिकी के मूल्यांकन पर आधारित है।

 

पृष्टभूमिः

         मूगा सुनहरे रेशम प्रकृति का एक अति सुन्दर उपहार है जिसे अपने चमकदार व सुन्दर बनावट और टिकाऊपन के लिए जाना जाता है। इसमें कम संरन्धता होने के कारण मूगा के धागे पर रंगाई नहीं जा सकती है जिससे उसमें सुनहरे रंग प्रतिधारित होते रहता है। मूगा धागे को हाथ से धोया जा सकता है तथा हर बार धोने के बाद इस रेशम की अपनी चमक बनी रहती तथा और वृद्धधि होती रहती है। मूगा रेशम धागा एन्थीरिया असामा नामक रेशम कीट से प्राप्त होता है। मूगा कीट को घरेलु तथा गैर- घरेलु के रूप में जाना जाता है। मूगा रेशम से बने मूगा मेखला चादर असमीया महिलाए के लिए विशेष आकर्षण का बिन्दु है। इसलिए असम की महिलाएं इसे बिहु, उत्सव तथा मांगलिक पर्व में पहनती है। इस गुणवत्ता के कारण जापान में किमोनोस प्रस्तुत करने के लिए इसकी मांग है। इसी तरह अमेरिका, ग्रीस,जर्मनी, दक्षिण अफ्रीका और फ्रांस जैसे देशों में इसकी बड़ी मांग है। चेन्नई में भौगोलिक संकेतक (जी.आई.) के पंजीकरण द्वारा असम के सुनहरे पीले मूगा को एक विशेष दर्ज प्रदान किया गया है। अति प्राचीन काल से ही, असम के भौगलिक क्षेत्र में मूगा रेशम में विद्यमान विशिष्ठ गुणवत्ता, प्रतिष्ठा और लक्षण के रूप में मूगा रेशम की पहचान की गई है। 

       एरी रेशम को एरंड अथवा एरंडी के नाम से जाना जाता है। खोले हुए कोसे से इसका धागा कता जाता है। अन्य रेशम की तरह एरी रेशम घरेलु बहुप्रज रेशम की एक प्रजाति है। सामिया रिसिनी कीट मुख्यतः एरंड भौज्य पोषक पौधे की पत्ति खाकर जीवित रहते हैं। यह पहनमें कपास के कपड़े की तरह ठंडक तथा ऊनी के कपड़े जैसे उष्म होता है। एरी रेशम के धागे स्थूलता होने के कारण इसे अन्य धागे के साथ मिश्रित कर बड़े व छोटे कपड़े बनाए जा सकते हैं जिसमें ड्रेस सामग्रियां, सजावटी कपड़े तथा चादर और तरह तरह मोटे कपड़े और दीवार के पर्दें के सामान तथा होजरी के हल्के प्रकार के वस्त्रादि शामिल हैं।

        समशीतोष्ण जलवायु के उष्णकटिवंधीय के साथ भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में सभी चार रेशम प्रजातियां अर्थात शहतूत, ओक तसर, एरी व मूगा जो वैश्विक रेशम उत्पादन के मानचित्र में अदम्य स्थान बने रहा है। इस क्षेत्र के रेशम उत्पादन में लगभग 1.80 लाख परिवार को लाभकर जीविका प्रदान कर रहा है। इस क्षेत्र की ताकत मूगा व एरी संवर्धन पर है। हालांकि, एरी संवर्धन पूर्वोत्तर भारत के मुख्य रूप से असम, मेघालय, अरूणाचल प्रदेश, नागालैंड और मणिपुर में किया जाता है। इसके अतिरिक्त भारत के कुछ गैर- रेशम उत्पादन राज्यों जैसे आन्ध्र प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, कनार्टक, महाराष्ट्र, उत्तरांचल, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़िसा और सिक्किम आदि राज्यों में विस्तारित हो रहा है। देश में पूर्वोत्तर भारत द्वारा उत्पादित कुल एरी रेशम उत्पादन में (90 प्रतिशत से अधिक) और गैर-शहतूत रेशम उत्पादन में (77 प्रतिशत) का योगदान किया गया है।       

       यद्यपि मेघालय, नागालैंड और अरूणाचल प्रदेश में मूगा रेशमकीट की प्रतिरूप प्रजाति मिलती है फिर भी भारत संघ के पूर्व में स्थित असम में पीला सुनहरे मूगा रेशम कीट उत्पादन करने में अद्वितीय रहा है। पूर्वोत्तर भारत के अपने प्राकृतिक निवास स्थान में भारी मात्रा में एन्थीरिया की समवर्गी प्रजातियां पायी जाती हैं।

        पूर्वोत्तर भारत में मूगा व एरी संवर्धन को बढ़ावा देने के लिए अनुसंधान व विकास के संबंध में केन्द्रीय रेशम बोर्ड, वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार ने सन् 1972 को तिताबर में केन्द्रीय मूगा एरी अनुसंधान स्टेशन की स्थापना की। केन्द्रीय रेशम बोर्ड द्वारा तिताबर में शहतूत के अनुसंधान में विकास के लिए क्षेत्रीय रेशम उत्पादन केन्द्र की स्थापना कर उसे सन् 1982 के दौरान केवल मूगा के अनुसंधान में विकास के लिए बोको में क्षेत्रीय मूगा अनुसंधान केन्द्र के नाम से स्थानांतरित किया गया। फिर से केन्द्रीय रेशम बोर्ड ने सन् 1987 के दौरान लाहदोईगढ़, जोरहाट में केन्द्रीय मूगा  अनुसंधान व प्रशिक्षण संस्थान के नाम से एक अनुसंधान व प्रशिक्षण का एक संस्थान की स्थापना की जो सन् 1999 के दौरान यह संस्थान पूर्णतः अनुसंधान व प्रशिक्षण के रूप में चालू हो गया तथा मूगा और एरी के क्षेत्रों में अधिदेश के साथ अनुसंधान व विकास का एक शीर्ष संस्थान के रूप में कार्य करने के लिए इसे केन्द्रीय मूगा एरी अनुसंधान व प्रशिक्षण संस्थान के नाम से नामाकरण किया गया।        

 

संस्थान के अधिदेशः

1.    अनुसंधान और मूगा रेशम उत्पादन और एरी के लिए विकास की सहायता प्रदान करने के लिए एक शीर्ष अनुसंधान संस्थान के रूप में कार्य करना।

2.    रेशम कीट के उत्पादन व उत्पादकता के साथ इसके खाद्य पौधे बढाने के लिए मूल, महत्वपूर्ण और अनुप्रयुक्त अनुसंधान करना।

3.    खाद्य पौधे व रेशमकीट की पारिस्थितिक प्रजातियां तथा संकरण पर सुधार करना।

4.    हाल ही में विकसित प्रौद्योगिकियां के स्थायित्व का आकलन करने के लिए सामजिकी -आर्थिक अनुसंधान करना

5.    विस्तार व प्रशिक्षण का यंत्र के माध्यम से अनुसंधान उपलब्धियां को उपयोगकर्ता के बीच विस्तारित करना।

 

संस्थान की गतिविधियाः

1.    मूगा व एरी के खाद्य पौधे तथा रेशमकीट जनन द्रव्य की खोज करना या पता लगना, इसका संग्रह करना, सन्निविष्ट करना और संरक्षण करना।

2.    मूगा व एरी रेशमकीटों तथा इसके भौज्य पौधे की उत्पादकता में सुधार लाने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी व अनुपयुक्त प्रयोग का विकसित करना।

3.    परम्परागत प्रजनन तथा जैव-प्रौद्योगिकी के माध्यम से मूगा व एरी का पारिस्थितिक प्ररूप में जनन द्रव्य के सुधार पर कार्य करना।

4.    पूर्वोत्तर भारत में स्थित अन्य अनुसंधान संस्थानों के साथ सहयोगात्मक अन्तर-संस्थागत अनुसंधान के कार्यक्रमों को बढ़ावा देना।

5.    व्यापक अवशोसन के लिए मूगा व एरी के कोसोत्तर की सहज निष्कर्षण प्रक्रिया, उत्पाद विविधीकरण तथा तत्संबंधी प्रौद्योगिकी को लोकप्रिय बनाने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी का विकास करना।

6.    पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में स्थित रेशम उत्पादन विभागों के साथ अधीनस्थ इकाइयों के जरिए विस्तार कार्यक्रमों आयोजन करें।

7.    मूगा व एरी कीटपालन की प्रौद्योगिकी,बीज प्रौद्योगिकी,धागाकरण व कताई पर प्रशिक्षण प्रदान करें तथा रेशम उत्पादन विभागों के कर्मचारियों को पुनश्चर्य़ा पाठ्यक्रम  पर प्रशिक्षण प्रदान करें।    

 

 

 

 

 

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